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इटावा/जसवंतनगर: दसलक्षण पर्व: क्यों मनाते हैं? इसके वास्तविक महत्व और प्रभाव पर: चेतन जैन ने विचार साझा किये।

संवाददाता: एम.एस वर्मा, इटावा ब्यूरो चीफ, सोशल मीडिया प्रभारी, 6397329270

  मनोज कुमार जसवंतनगर



दसलक्षण पर्व: क्यों मनाते हैं? इसके वास्तविक महत्व और प्रभाव पर: चेतन जैन ने विचार साझा किये 

जसवंतनगर/इटावा

8 सितंबर से देश भर में दसलक्षण महा पर्व प्रारम्भ हो जायेगे जो कि 17 सितंबर तक 10 दिनों तक जैन समाज में दसलक्षण पर्व मनाया जाएगा।इस पर्व की पौराणिकता व प्रामाणिकता पर प्रकाश डालते हुए पत्रकारो को चेतन जैन ने बताया कि यह पर्व आत्मचिंतन, तपस्या और हमारे जीवन में सद्गुणों को विकसित करने का समय है। हर दिन एक विशेष गुण को समर्पित होता है, और हम इन गुणों को अपने आचरण में उतारने का प्रयास करते हैं।

क्या आपने कभी सोचा है कि दसलक्षण पर्व हमारे जीवन में इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

इस पर्व को मनाना आपके लिए क्या मायने रखता है?

इन दस गुणों को अपने दैनिक जीवन में शामिल करने के आपके अनुभव क्या रहे हैं?

आइए, इस पर्व के महत्व और इसके पीछे की गहरी सोच पर प्रकाश डाले


दशलक्षण महापर्व  वर्ष में तीन बार आता है  भादों सुदी 5 से 14 तक, माघ सुदी 5 से 14 तक , चैत्र सुदी 5 से 14 तकतथापि सारे देश में विशालरूप में बड़े उत्साह के साथ मात्र भादों सुदी 5 से 14 तक, ही मनाया जाता है। बाकी दो को तो बहुत से जैन लोग भी जानते तक नहीं है। प्राचीन काल में बरसात के दिनों में आवागमन की सुविधाओं के पर्याप्त न होने से व्यापारादि कार्य सहज ही कम हो जाते थे। तथा जीवों की उत्पत्ति भी बरसात में बहुत होती है। अहिंसक समाज होने से जैनियों के साधुगण तो चार माह तक गांव से गांव भ्रमण बंद कर एक स्थान पर ही रहते हैं, श्रावक भी बहुत कम भ्रमण करते थे। अतः सहज ही सत्समागम एवं समय की सहज उपलब्धि ही विशेष कारण प्रतीत होते हैं - भादों में ही इसके विशाल पैमाने पर मनाये जाना उत्तमक्षमादि धर्मों की सार्वभौमिक त्रैकालिक उपयोगिता एवं सुखकरता के कारण ही दशलक्षण महापर्व शाश्वत पर्वों में गिना जाता है और इसी कारण यह महापर्व है।

वैसे तो प्रत्येक धार्मिक पर्व का प्रयोजन आत्मा में वीतरागभाव की वृद्धि करने का ही होता है, किंतु इस पर्व का संबंध विशेष रूप से आत्म-गुणों की आराधना से है। अतः यह वीतरागी पर्व संयम ओर साधना का पर्व है।

यहां एक प्रश्न संभव है कि यह महापर्व त्रैकालिक है, अनादि-अनन्त है,  इनके आरंभ होने की कथा इस तरह कहीं जाती है?

कहा जाता है कि कालचक्र के परिवर्तन में कुछ स्वाभावितक उतार-चढ़ाव आते हैं जिन्हें जैन परिभाषा में अवसर्पिणी में कुछ उत्सर्पिणी के नाम से जाना जाता है। अवसर्पिणी में क्रमशः ह्रास और उत्सर्पिणी में क्रमशः विकास होता है। प्रत्येक अवसर्पिणी और उत्सर्पिणी में छह-छह काल होते हैं।


प्रत्येक अवसर्पिणी काल के अंत में जब पंचम काल समाप्त और छठा काल आरंभ होता है, तब लोग अनार्यवृत्ति कर हिंसक हो जाते हैं। उसके बाद जब उत्सर्पिणी आरंभ होती है और धर्मोत्थान का काल पकता है, तब श्रावण कृष्ण प्रतिपदा से सात सप्ताह (49 दिन) तक विभिन्न प्रकार की बरसात होती है, जिसके माध्यम से सुकाल पकता है और लोगों में पुनः अहिंसक आर्यवृत्ति का उदय होता है; एकप्रकार से धर्म का उदय होता है, आरंभ होता है और उसी वातावरण में दश दिन तक उत्तमक्षमादि दशधर्मों की विशेष आराधना की जाी है तथा इसी आधार पर हर उत्सर्पिणी में यह महापर्व चल पड़ता है।

यह कथा तो मात्र यह बताती है कि प्रत्येक उत्सर्पिणी काल में इस पर्व का पुनरारम्भ कैसे होता है। इस कथा से दशलक्षण महापर्व की अनादि-अनन्तता पर कोई आंच नहीं आती ।

दशलक्षण पर्व जैनों का सबसे महत्वपूर्ण एवं महान पर्व है। दशलक्षण पर्व हम लोक युगारंभ के उद्देश्य से मनाते है। जब पंचमकाल के बाद इस सृष्टि का प्रलय काल आएगा, सृष्टि विनष्ट होगी उसके बाद सुकाल के समय में 7 -7 दिन की 7 सुवृष्टियाँ होती हैं यानी 49 दिन होते हैं, वो 49 दिन आवण बढ़ी एकम से लेकर भादो चौध तक होते हैं और 50वें दिन से जब सृष्टि की शुरुआत हुई तो हमने उसे युगारंभ माना और उसकी शुरुआत हमने धर्म की सारी दुनिया में लोग अलग-अलग तरीके से धर्म करते है, पूजा-पाठ, उत्सव, आराधना आदि।

जैन धर्म में भी बहुत सारे ऐसे पर्व त्यौहार है जिसमें पूजा-पाठ, आराधना आदि की महत्ता है। दशलक्षण महापर्व में भी हम पूजा तो करते हैं पर भगवान की नहीं, अपितु 10 दिन दस महत्वपूर्ण गुणों की जिन्हें हम दस धर्म कहते हैं।

जैन धर्म की विशेषता है कि व्यक्ति की अपेक्षा गुणों की पूजा को स्थान दिया गया है। इसका प्रमाण है हमारा मूलमंत्र णमोकार मंत्र जिसमें किसी व्यक्ति को नहीं बल्कि अरिहंतों को, सिद्धों को आचायों को, उपाध्याय को लोक के सर्व साधुओं को नमस्कार किया गया है। तीर्थंकरों की पूजा को महापर्व नहीं कहा गया और न ही अन्य पूजा को परन्तु दशलक्षण पर्व को महापर्व की संज्ञा दी गयी है। दस धर्म के उदात्त जीवन मूल्य हैं, जो हर व्यक्ति के व्यक्तित्व के लिए जरूरी है।

इसलिए 10 दिनों में विशेष रूप से दस धर्मों की आराधना करके हम अपने अंदर इन गुणों के संस्कारों को भरते हैं। इन 10 दिनों में हम अपने आपको रिचार्ज करते है ताकि आने वाले 355 दिनों तक उसका असर हम पर रह सके गुणों का आराधन के साथ त्याग तपस्या करते हैं। लोग उपवास करते हैं. एकासन करते हैं और अपने जीवन में संयम का पाठ पढ़ते हैं। इस तरह दशलक्षण उदात्त जीवन मूल्यों की आराधना का पर्व है। जिसमें हम जीवन मूल्यों की आराधना करते हैं 

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