गोठे सूने हुए, मगर सर्जा-राजा से रिश्ता कायम…!
मशीनीकरण ने बैलों की जगह ली…..
सूखे ने बढ़ाई मुश्किलें; फिर भी महाराष्ट्र के गांवों में पोळा त्योहार ने जिंदा रखी परंपरा…..
अहिल्यानगर, 10 सितंबर।
कभी महाराष्ट्र के गांवों की सुबह बैलों के गले में बंधे घुंघरुओं की झंकार से होती थी। खेतों की मेड़ों पर बैलों की टापें किसान की मेहनत की पहचान थीं और गोठा उसके ग्रामीण संसार की धड़कन। लेकिन वक्त बदला और खेती भी बदल गई। बैलों की जगह ट्रैक्टरों ने ली, गोठे सूने हुए और खेती का पारंपरिक चेहरा धीरे-धीरे मशीनों में बदल गया।
बढ़ती लागत, चारे का संकट और मशीनीकरण के कारण बैल अब ग्रामीण अर्थव्यवस्था में पहले जैसे दिखाई नहीं देते। लेकिन किसान और उसके मूक साथी के बीच का भावनात्मक रिश्ता आज भी कायम है।

इसी रिश्ते का प्रतीक है पोळा—महाराष्ट्र का वह पर्व, जब किसान वर्षभर खेतों में साथ देने वाले बैलों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता है।
इस वर्ष सूखे की मार के बीच भी अहिल्यानगर जिले के गांवों में पोळा श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया गया। शेवगांव तहसील के बोधेगांव में परंपरा की अनोखी तस्वीर देखने को मिली।
9 सितंबर की रात बैलों को हल्दी और मक्खन लगाकर कंधों की मालिश की गई। अगले दिन गुड़ और बाजरे की रोटी का नैवेद्य चढ़ाया गया। शाम को सजे-धजे बैल मारुति मंदिर के प्रांगण में पहुंचे।
यहां शिवाजी बापू पवार के मान के बैल ने परंपरा के मुताबिक गांव के प्रवेशद्वार पर लगा आम का तोरण तोड़ा। इसके बाद ही अन्य किसानों ने अपनी बैल जोड़ियों को वेशी से बाहर निकाला। बैलों की मंदिर परिक्रमा के बाद घर-घर पूजा और आरती हुई तथा उन्हें पुरणपोली का निवाला खिलाया गया।
यह सिर्फ एक गांव की तस्वीर नहीं, बल्कि बदलते ग्रामीण भारत की कहानी है।
मशीनों ने खेती आसान की है, लेकिन किसान के दिल से अपने मूक साथी की जगह नहीं छीन पाई।
ट्रैक्टरों ने खेतों की कमान संभाल ली, मगर सर्जा-राजा के प्रति कृतज्ञता आज भी गांवों की मिट्टी में जिंदा है।
