भूलकर भी गुरु को मनुष्य नहीं समझना चाहिए: आचार्य श्री पुरुषोत्तम दास त्यागी जी महाराज
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“सादर जय सियाराम”
“गुरुतत्व और भगवततत्व दोनों में कोई अंतर नहीं”
“गुरुतत्व और परमात्मतत्व में कोई अंतर नहीं ”
भगवान श्री कृष्ण स्वयं कहते हैं-
“आचार्य मां विजानीयात् , नावमन्येत कर्हिचित् ।”
आचार्य को हम ही समझों मैं ही आचार्य हूं ।
और शास्त्र कहता है-
“सर्वदेवमय: गुरु:”-गुरु में सभी देवता का वास होता है ।
इसलिए अपने गुरुदेव को , अपने आचार्य को कभी मनुष्य नहीं समझना चाहिए ।
यही शिष्य धर्म का प्रथम सूत्र है ।
पतन कैसे होता है ?
जब जीव अपने आचार्य को अपने गुरुजनों को मनुष्य समझ लेता है , तब उसकी बुद्धि में गुण-दोष का चश्मा लग जाता है ।
वह सोचने लग जाता है-गुरूदेव ऐसा करते हैं , वैसा करते हैं ।
और जिस क्षण शिष्य की दृष्टि में गुरु के प्रति दोष-दृष्टि आ जाती है उसी क्षण उसका पतन हो जाता है ।
उसका भजन , उसका जप , सब निष्फल हो जाता है ।
इसलिए कभी भी , भूलकर भी गुरु को मनुष्य नहीं समझना चाहिए ।
गुरु कौन है ?
गुरु स्वयं भगवान है ,
अब सबसे गूढ़ रहस्य-अगर गुरुदेव में क्रोध दे तो ?
यह प्रश्न सबके मन में आता है ।
गुरुदेव का इसका समाधान ,
अगर आचार्य में बहुत क्रोध हो , गुरुदेव में बहुत क्रोध दिखाई दे , तो घबराना नहीं , दोष नहीं देखना ।
तब यह भावना कर लेनी चाहिए कि गुरुदेव लीला कर रहे हैं ।
यह गुरुदेव की नृसिंह लीला चल रही है ।
जैसे भक्त प्रहलाद की रक्षा के लिए नृसिंह भगवान को बड़ा क्रोध आया था , वह क्रोध भी करुणा भरा था ।
वह क्रोध विनाश के लिए नहीं , भक्त के कल्याण के लिए था ।
वैसे ही जब गुरुदेव डांटते हैं , क्रोध करते हैं , तो वह हमारे भीतर बैठे हिरण्यकश्यपु रुपी अहंकार को मारने के लिए है ।
वह क्रोध नहीं , वह कृपा का ही दूसरा रूप है ।
तो संकल्प क्या लें ?
1-हम आज से अपने गुरुदेव को साक्षात् भगवान के रुप देखेंगे ।
2-हम गुण-दोष देखना बंद करेंगे ।
केवल कृपा का अनुभव करेंगे ।
3-अगर कभी डांट पड़े , तो समझेंगे -नृरसिंह लीला हो रहा है ,
मेरा अहंकार जल गया है ।
यही भावना हमें बचायेगी ।
[आचार्य श्री पुरुषोत्तम दास त्यागी जी महाराज]
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