शिष्य को अपनाना ही गुरुदेव की सबसे बड़ी कृपा: आचार्य श्री पुरुषोत्तम दास त्यागी जी महाराज
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“सादर जय सियाराम”
“वस्तु अमोल दी मेरे सतगुरु , कृपा कर अपनायो”
गुरुदेव की सबसे बड़ी कृपा , विशेष कृपा में से एक कृपा यह भी है कि गुरुदेव ने हमें अपना लिया , गुरुदेव ने हमें स्वीकार कर लिया ,
यह वस्तु क्या है ? यह तो वही अमोलक वस्तु है जो बाजार में नहीं मिलती ।
यह वस्तु है- श्रीसीताराम नाम
गुरुदेव ने हमें हीरे-मोती नहीं दिये , उन्होंने हमें वह दिया जो हीरों से भी अमोलक है- वह नाम रुपी धन ।
1-अमोलक क्यों है ?
क्योंकि धन खर्च करने से घटता है , पर नाम रुपी धन जपने से बढ़ता है ।
धन चोर चुरा सकता है , पर नाम को कोई नहीं चुरा सकता
धन मृत्यु पर यहीं रह जाता है , पर नाम रुपी धन मृत्यु के बाद भी साथ जाता है ।
2-कृपा कर अपनायो :
हममें कोई योग्यता नहीं थी , न भक्ति थी , न ज्ञान था ।
हम तो संसार की ठोकरें खा रहे थे पर सतगुरु न कृपा की और अपना लिया ।
शिष्य को अपना बनाना ही गुरुदेव सबसे बड़ी कृपा है ।
शिष्य को अपनाना ही गुरुदेव की सबसे बड़ी कृपा है ।
गुरुदेव ने शिष्य से कहा-“तू मेरा है”
जिसे सद्गुरु अपना ले , उसकै फिर कोई भाव भी बांका नहीं कर सकता ,
3-इस वस्तु को संभाल कर रखना है:
गुरुदेव ने वस्तु दे दी है , अब इसे संभालना हमारा काम है ।
1-इसे वाणी में रखो- हर श्वास में सीताराम ।
2-इसे कर्म में रखो- ताकि हमारे कर्म से हमारे गुरुदेव की महिमा बढ़े ।
3-इसे भीतर की ओर मोड़ों-जागरुकता के साथ ।
हम सभी आचार्य श्री के शिष्य हैं , जिसके पास यह अमोलक वस्तु है , वे दुनिया के सबसे धनवान हैं ।
गुरुदेव का आशिर्वाद , गुरुदेव की कृपा ही शिष्य का सबसे बड़ा सौभाग्य है ।
गुरुदेव के मार्गदर्शन पर चलने वाला शिष्य कभु अपने जीवन में भटकता नहीं ।
संसार के लोग जो वस्तु देते हैं तो उसका मोल लगाते हैं ।
पर सदगुरु ने जो वस्तु दी है , वह अमोलक है- जिसका कोई मोल नहीं ।
जिसे सतगुरु अपना ले , उसे फिर भटकना नहीं पड़ता ,
क्योंकि सदगुरुदेव ही शिष्य को सदमार्ग दिखाते हैं ।
क्योंकि सदगुरुदेव ही शिष्य को सही मार्ग दिखाते हैं ।
धन्य हुआ हमारा जीवन जो ऐसा सतगुरु हमने पाया ।
आपका मार्गदर्शक ,
[आचार्य श्री पुरुषोत्तम दास त्यागी जी महाराज]
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