गुरुजनों ने क्या दिया , इसे भूलना नहीं चाहिए : आचार्य श्री पुरुषोत्तम दास त्यागी जी महाराज
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“सादर जय सियाराम”
“गुरु तत्व की महिमा”
प्रत्येक शिष्य को ऐसा करना चाहिए , ऐसा मानना चाहिए ,
गुरुदेव ! आपने जो भजन का मार्ग दिखाया है , उस पर हम निष्ठापूर्वक चल सकें , बस ऐसी कृपा करों ।
यही एक भाव सच्चे शिष्य के हृदय में होना चाहिए ।
गुरुदेव कहते हैं-
हमारा हृदय का जो ज्ञान , वैराग्य और भक्ति है , वह तुम्हें प्राप्त हो ।
यह पूर्ण उतराधिकार है ।
आध्यात्मिक सम्पत्ति का खजाना , वो तिजोरी भी आपको दें रहा हूं ।
और तिजोरी की चाबी है गुरु- भक्ति ।
इसलिए गुरुजनों ने क्या दिया , इसे भूलना नहीं चाहिए
गुरुदेव ने सीताराम नाम सुना दिया , इससे बड़ी कोई वस्तु नहीं है ।
गुरुदेव नया जन्म दें दिया ,
ने संस्कार का स्वरुप दें दिया-क्या नहीं दिया सब कुछ दें दिया ।
श्रद्धावान सद्शिष्य को यह अनुभव करना चाहिए कि हमारे जैसे मलिन जीव को स्वयं भगवान हु गुरुदेव के रूप में आकर साधक बनकर , उपासक बनकर साधना की पद्धति हमें सीखा रहे हैं ।
यदि हम गुरुदेव के पद चिन्हों चलें , उनका पद-अनुगमन करें , तो हमारा यह शरीर अंतिम शरीर होगा , हमारा
यह जन्म अंतिम जन्म होगा ।
शिष्य को ऐसी भावना होनी चाहिए कि गुरु को भगवत रुप से देखें ।
पर गुरु के भीतर यह भाव कभी नहीं आना चाहिए कि “मैं ही भगवान हूं , अब राम कृष्ण नारायण की आवश्यकता नहीं है ।
जो ऐसा मानते हैं , वे सनातन धर्म को नष्ट करने में लगे हैं ।
सच्चे गुरु के मन तो यही होना चाहिए कि- हम भगवान के भक्त हैं ।
हम भगवान के दास हैं , परमार्थ में हम आपके सहयोगी हैं ।
जहां कहीं आप भटकेंगे , हम आपका मार्गदर्शन करेंगे ।
गुर सिष बधिर अंध का लेखा ।
एक न सुनइ एक नहिं देखा ।।
हरि सिष्य धन सोक न हरी ।
सो गुर घोर नरक महुं परई ।।
गुरु दृष्टिहीन है और चेला बहरा है-
यह सबसे दुखद स्थिति है ।
अंध कौन है ?
जो परोक्ष और अपरोक्ष-दोनों प्रकार की अनुभूतियों से वंचित हैं ।
और बहरा कौन है ? जो अपने पूज्य गुरुजनों की बात को श्रद्धापूर्वक श्रवण नहीं करता जो अपने पूज्य गुरुजनों की बात को श्रद्धापूर्वक नहीं सुनता है ।
याद रखना- कोई व्यक्ति किसी का कल्याण नहीं करता , शिष्य की श्रद्धा ही शिष्य का कल्याण करती है ।
समर्थ से समर्थ सदगुरू हों , पर जैसी श्रद्धा गुरु तत्व में होनी चाहिए , वैसी श्रद्धा न हो तो वे भी शिष्य का कल्याण नहीं कर सकते ।
और यदि सामने अत्यंत सामान्य व्यक्ति भी हो , जिसमें न संत लक्षण हों , न गुरु के लक्षण घटित हो रहे हों , पर शिष्य की श्रद्धा परिपूर्ण ऊ- तो उसे यह भाव आ जाता है कि “सद्गुरु रुप में स्वयं भगवान ही हमें मिलें हैं “और उतने से ही उस शिष्य का काम सिद्ध हो जाता है ।
[आचार्य श्री पुरुषोत्तम दास त्यागी जी महाराज]
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