किसी को पीड़ा पहुंचाना किसी को कष्ट देना यह हमारा धर्म नहीं: आचार्य श्री पुरुषोत्तम दास त्यागी जी महाराज

किसी को पीड़ा पहुंचाना किसी को कष्ट देना यह हमारा धर्म नहीं: आचार्य श्री पुरुषोत्तम दास त्यागी जी महाराज

 

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“सादर जय सियाराम”

वैष्णव जन तो तेने कहिए जे पीड़ पराई जाणे ये”

पर दुखे उपकार करे तो मन अभिमान न आणे ये”

भगवान भक्त वहीं है जो दूसरों के दुःख और दर्द को महसूस करता है ।

और दूसरों की भलाई और मदद करता है ।

लेकिन अपने मन में कभी भी अहंकार या घमंड नहीं लाता , वैष्णव जन वह होता है भगवान का भक्त वह होता है जो प्राणी मात्र का सेवा करता है , सबका सम्मान करता है , किसी की निंदा नहीं करता है

और अपने मन और वचन और पवित्र रखता है ।

उसको वैष्णव कहते हैं भगवत भक्त कहते हैं ।

वैष्णव ही भगवान का भक्त होता है ।

हम सनातनी हैं , किसी को पीड़ा पहुंचाना किसी को कष्ट देना यह हमारा धर्म नहीं है , हमारे यहां देख-देख कर चलते हैं कहीं पैर के नीचे चींटी न आ जाए और मेरे द्वारा अगर चींटी मारी जाती है तो उसका दोष मुझे लगेगा हम चींटियों को बचा-बचा कर चलते हैं ।

चींटी को आटा और चीनी डालते हैं ,

गऊ माता की सेवा करते हैं , पंछियों की सेवा करते हैं , पशुओं की सेवा करते हैं , प्रत्येक जीव मात्र की हमारा धर्म है सेवा करना , जहां जीवों के प्रति दया और धर्म पूर्वक आचरण होता है

प्रत्येक जीवों के प्रति दया करना , दया धर्म का मूल है , ऐसा हमारे शास्त्रों में , और संतों ने कहा है ।

दया वास्तव में धर्म का मूल है , द यानी दान , द यानी दया करना द यानी दमन करना ,

हम मनुष्यों के लिए तीनों द बहुत उपयोगी है , इन्द्रियों का दमन करना , प्रत्येक जीव मात्र पर दया रखना और प्रारब्ध के हिसाब से जो हमें मिला है उसका दान करना ताकि धन की कमी न आये और धन की शुद्धि हो जाती है

जहां धर्म आचरण होता है उन्ही के जीवन में सुख-शांति और समृद्धि और ऐश्वर्य सद्भाव सदा बना रहता है ,

[आचार्य श्री पुरुषोत्तम दास त्यागी जी महाराज]

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