गुरुदेव की कृपा से अखिल विश्व में इस एक ज्योति को फ़ैलाने का सौभाग्य प्राप्त हो रहा: आचार्य श्री पुरुषोत्तम दास त्यागी जी महाराज

 

गुरुदेव की कृपा से अखिल विश्व में इस एक ज्योति को फ़ैलाने का सौभाग्य प्राप्त हो रहा: आचार्य श्री पुरुषोत्तम दास त्यागी जी महाराज

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“सादर जय सियाराम”

“अखिल विश्व पुरुषोत्तम परिवार सेवाज्ञ”

अखिल विश्व पुरुषोत्तम परिवार सेवाज्ञ पर एक छोटी सी कथा ,

“एक दिया , सारा विश्व”

एक बार एक संत अपने शिष्यों के साथ बैठे थे ।

संत ने एक दिया जलाया और बीच में रख दिया ।

शिष्यों ने पूछा – गुरुदेव ये क्या है ?

संत बोले -ये है पुरुषोत्तम परिवार ।

शिष्य – पर गुरुदेव , इसमें तो केवल एक ही बाती है ?

संत मुस्कुराए और बोले – देखो …..

संत ने एक दिए से सैकड़ों दिए जला दिए….

पूरा आश्रम जगमगा उठा ।

संत बोले – पहला दिया गुरुदेव हैं …..

और बाकी सारे दिए कौन हैं ?

संत बोले –

एक दिया जला अयोध्या में ,

एक दिया जला बिहार में ….

एक दिया जला राजस्थान में – नाम पड़ा अजेय कीर्तनगढ ।

एक दिया जला मध्यप्रदेश में…

एक दिया जला नेपाल में …..

एक दिया जला जनकपुर में ..

एक दिया जला गुजरात में…

एक दिया जला अंडमान , निकोबार में ….

एक दिया जला दीव में ….

एक दिया जला विदेश में …

हर दिया अलग-अलग जगह है , पर ज्योति सब में एक ही है ।

ज्योति एक, दिए अनेक ।

गुरु एक शिष्य अनेक ।

परिवार एक , परिवार के सदस्य अनेक ।

नाम एक सीताराम ।

शिष्य ने पूछा , गुरुदेव , तो हमारा परिवार कितना बड़ा है ?

संत ने आकाश की ओर देखा और कहा-

जहां-जहां सीताराम का नाम पहुंचेगा ,

वहां-वहां हमारा परिवार बसेगा ।

जो भी सीताराम नाम जाप नाम संकीर्तन करेगा , वह पुरुषोत्तम परिवार सेवाज्ञ का सदस्य है ।

यही है अखिल विश्व पुरुषोत्तम परिवार सेवाज्ञ ।

इसका कोई नक्शा नहीं …

इसका आधार -जमीन नहीं अपितु भाव है ।

शिष्य- और सेवाज्ञ कौन है गुरुदेव ?

संत बोले – जो इस लिए में तेल डालता रहें….

जो प्रतिदिन नाम का तेल डालें ,

सेवा की बाती को ठीक करे ,

और ध्यान रखें कि कोई दिया बुझने न पाए….

वही है सेवाज्ञ ।

वो दिया नहीं जलाता , दिए को संभालता है ।

वो परिवार का मुखिया नहीं बनता अपितु , सेवक बनता है

शिष्यगण…..

दिया जलाना आसान है ,

दिए को जलाए रखना कठिन है ….

और वह कठिन कार्य हमें गुरुदेव ने हमें सौंपा है ।

गुरुदेव की कृपा से अखिल विश्व में इस एक ज्योति को फ़ैलाने का सौभाग्य प्राप्त हो रहा है ।

एक गांव से दूसरे गांव , एक घर से दूसरे घर ,

एक हृदय से दूसरे हृ…..

🙏🙏दूसरी कथा🙏🙏

 

एक गांव में अकाल पड़ा ।

सबके घर में अनाज खत्म हो चुका था ।

सबके घर का अनाज बीत गया था ।

सब भूखे ।

उसी गांव में एक बूढ़ी माता जी रहती थी ।

अकेली ।

उनके घर में भी बस एक आखिरी रोटी बची थी ।

माता जी सोचने लगी- मैं ये रोटी खा लूं , तो आज तो जी लूंगी , पर कल ?

तभी दरवाजे पर आवाज आई-

“जय सियाराम… थोड़ा जल मिलेगा ?”

एक युवा साधु खड़ा था… थका हुआ , भूखा ।

माता जी ने देखा… और बिना सोचे अपनी वो आखिरी रोटी साधु को दे दिया ,

साधु ने रोटी हाथ में ली … और बोला-

माता जी आपने अपनी आखिरी रोटी मुझे दे दी ?

माता जी आपके पास तो कुछ भी नहीं बचा…

माता जी बोली – बेटा मेरे गुरुदेव ने कहा था…

“जो आपका अपना हो , वो भूखा नहीं सोना चाहिए।”

बेटा अपने सीताराम कहा … तो इसलिए आप अपने हुए मेरे हुए…

अपना भूखा रहे , और मैं का लूं ….ये तो पाप है ।

साधु की आंखों में आसूं आ गया ।

उस रोटी की दो भाग किए… एक भाग माता जी को दे दिया और एक भाग स्वयं ले लिया ।

और साधु बोला-

माता जी आज आप अकेले नहीं हैं ।

आज से आप “अखिल विश्व पुरुषोत्तम परिवार सेवाज्ञ” की एक सदस्य है ।

माता जी बोली – ये कौन‌ सा परिवार है बेटा ?

साधु बोला –

माता जी ये वो परिवार है…

जहां कोई अपना-पराया नहीं ।

जहां भूख एक की हो दर्द सबको होता है ।

जहां रोटी एक की हो , तो बंटवारा सब में होता है ।

जहां एक रोज , तो सब रोते हैं….

जहां एक हंसे , तो सब हंसते हैं ।

इस परिवार में खून का रिश्ता नहीं अपितु नाम का रिश्ता जरूर है ।

सीताराम नाम की ।

माता जी बोली- बैठा इतना बड़ा परिवार…

इसका मुखिया कौन है ?

साधु ने आकाश की ओर हाथ जोड़कर और कहा+

इसका मुखिया कोई आदमी नहीं कोई इंसान नहीं ,

इसका मुखिया स्वयं भगवान है ।

इसका मुखिया -पुरुषोत्तम जी सरकार है ।

और हम सब …हम सब बह सेवाज्ञ हैं ।

सेवा करने वाले …रोटी बांटने वाले ।

माता जी …ये परिवार दीवारों से नहीं , एक पवित्र हृदय से बनता है ।

ये जमीन पर नहीं भाव पर बसता है ।

आज आपने अपनी आखिरी रोटी लेकर बता दिया की आप इसी परिवार की है ।

भक्तगण एवं शिष्यगण कथा यही विराम नहीं होती….

कहते हैं उस दिन के बाद उस गांव में चमत्कार हुआ ।

जिस-जिस घर में एक रोटी थी , उसने आधी अपने पड़ोसी को दें दिया ,

जिसके पास जल था , वह प्यासे को पिला दिया , और

देखते-देखते…. आकार तो रहा , पर कोई भूखा नहीं सोया ।

क्यों ?

क्योंकि अब गांव नहीं रह गया था….

वो बन गया था अजेय कीर्तनगढ ।

और वो सब बन गये थे –

अखिल विश्व पुरुषोत्तम परिवार सेवाज्ञ के सदस्य ।

इस कथा का सार एक ही है ।

परिवार वो नहीं जो साथ रहे ,

परिवार वो है जो साथ दें ।

जब अपनी आधी रोटी भी आंधी करनी आ जाए ,

तो समझो तुम परिवार में जी रहे हो ।

और अंतोगत्वा गुरुदेव तो यही कर रहे हैं ।

अपनी आखिरी ऊर्जा , अपनी आखिरी समय , अपनी आखिरी सांस तक….

बस बांट रहे हैं… नाम बांट रहे , प्रेम बांट रहे हैं ।

इसलिए आप सेवाज्ञ है महाराज जी…

जय सियाराम ,

“अखिल विश्व पुरुषोत्तम परिवार सेवाज्ञ”

[आचार्य श्री पुरुषोत्तम दास त्यागी जी महाराज]

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