इस करुणा का ऋण 100 जन्म लेकर नहीं चुका सकते: आचार्य श्री पुरुषोत्तम दास त्यागी जी महाराज

 

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“सादर जय सियाराम”

“परम मंगलमय परात्पर ब्रह्म (अखिलेशश्वर)श्री सीताराम जी एवं अकारण करुणा वरुणालय भक्तवान्क्षा कल्पतरु पूज्य गुरुदेव ,

पूज्य गुरुदेव भगवान को कोटि-कोटि प्रणाम ।

आदरणीय भक्तगण एवं शिष्यगण को शुभ एवं मंगलमय कामना ,

1-आप अकारण करुणा वरुणालय हैं गुरुदेव ।

हमने कुछ किया नहीं फिर आपने हमें अपना लिया , गिरता रहा हर बार आपने थाम लिया ।

आप अकारण करुणा वरुणालय हैं गुरुदेव ।

जैसे बादल बिना पूछे बरसाते हैं ,

वैसे ही आपकी कृपा बिना कारण बरसती है ।

आप अकारण करुणा वरुणालय हैं गुरुदेव ।

अयोग्य समझकर दुनिया ने ठुकराया पर गुरुदेव आपने इस दास को चरणों में जगह दिया ।

आप अकारण करुणा वरुणालय हैं गुरुदेव ।

मेरे अपराध गिरते तो हजार बार छोड़ देते ,पर आपने करुणा से सब कुछ भुला दिया आप अकारण करुणा वरुणालय हैं गुरुदेव ।

इस करुणा का ऋण 100 जन्म लेकर नहीं चुका सकते ।

गुरुदेव स्वयं मंगल के मुर्ती हैं

गुरुदेव स्वयं मंगल के सागर हैं ।

जहां भी जब भी गुरुदेव को स्मरण करते ही अमंगल भाग जाता है ।

जब गुरुदेव की कृपा से शिष्य का जीवन सुधर जाता है ।

गुरुदेव का दर्शन करने से हजारों तीर्थो का फल प्राप्त होता हैं ।

गुरुदेव सबसे ऊपर और सबसे परे हैं ।

गुरु कृपा ही केवलं शिष्यस्य परम मंगलम् ।

शिष्य के लिए गुरुदेव की आज्ञा ही जीवन होता हैं ।

शिष्य के लिए गुरुदेव की चरण धूली ही पूंजी है ।

और शिष्य के लिए गुरु कृपा ही मुक्ति है ।

हम लोग छोटे-छोटे स्वामी बनते हैं ।

घर के , आफिस के , पैसे के , पर असली स्वामी तो सिर्फ एक ही है ।

अखिलेशश्वर ।

संपूर्ण ब्रह्मांड जिसकी आज्ञा से चलता है ।

सूरज निकलता उसकी आज्ञा से , हम स्वास जो लेते हैं उनकी कृपा से ,वो परात्पर ब्रह्म हैं ।

सबसे ऊपर सबसे परे हैं ।

फिर भी वह भक्तवत्सल बनकर हमारे बीच आ जाता हैं ।

गुरुदेव के रूप में ,

बस गुरु आज्ञा मान लों तर्क मत करो ।

मान गए तो कल्याण , ना माने तो विकार ।।

हम अयोग्य है पर गुरुदेव आपके हैं ।

हाथ मत छोड़ना बस चरणों में जगह देना ।

आपने “परम मंगलमय” होकर मेरा जीवन मंगल कर दिया ।

जहां अंधकार था , वहां उजाला कर दिया ।

मैं गिर रहा था आपने उठाया

इससे बड़ी कृपा और क्या होगी ।

जिसे सद्गुरुदेव मिल जाते हैं उसे कुछ और पाना शेष नहीं रह जाता हैं ।

बस जीवन में एक भाव बना रहे की ,

“गुरुदेव जो करें , वही हमारे लिए सर्वोत्तम”

गुरुदेव आप परम मंगलमय हैं

इसलिए हमारे जीवन के हर अमंगल को अपने मंगल में बदल दिया ।

जहां निराशा थी , वहां आशा जगा दी ।

जहां अंधकार था , वहां पर आपने श्री सीताराम जी के नाम का दीपक जला दिया ।

मेरे जैसे तुच्छ को भी गुरुदेव ने अपना लिया ।

गुरुदेव ने हमारी पुकार सुन लिए ,

गुरुदेव हमें अपना मानते हैं ।

इससे बड़ी कृपा क्या होगी ?

गुरुदेव जो करें वही ठीक है ।

गुरुदेव आपकी कृपा से ही मेरा परम मंगल है ।

कोटि-कोटि प्रणाम गुरुदेव आपके चरणों कमलों में ,

शब्द विराम , भाव शेष ।

और आंखों में आसूं इस बात के गवाह हैं कि ,

आप परम मंगलमय हैं गुरुदेव

आप मिल गए तो समझो सब कुछ मिल गया ।

गुरुदेव आपके चरणों की धूल भी कल्याण कर देती है ।

इसलिए भक्त बार-बार उसी धूल को माथे लगाते हैं ।

“गुरुदेव आपकी कृपा पर्याप्त है”

अब और किसी मंगल की कामना ही नहीं रही ।

यही वाणी का विराम ,

सादर जय सियाराम ,

[आचार्य श्री पुरुषोत्तम दास त्यागी जी महाराज]

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