चैनल के नेशनल लीगल एडवाइजर अधिवक्ता राजेश कुमार की कलम से। बेटियों से सवाल, सत्ता से खामोशी—आखिर कब जागेगा हमारा समाज?
महिलाओं की सुरक्षा, युवाओं के भविष्य और सरकार की जवाबदेही पर एक बेचैन नागरिक की आवाज
✍️ अधिवक्ता राजेश कुमार की कलम से
आज मैं निःशब्द हूँ। लिखते समय मेरे हाथ काँप रहे हैं। मन में पीड़ा है, आक्रोश है और एक सवाल लगातार उठ रहा है—क्या हम उसी भारत में जी रहे हैं, जिसके लिए हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने अपना जीवन समर्पित किया था?
महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस और लाला लाजपत राय के संघर्षों से स्वतंत्र हुए इस देश में आज भी किसी बेटी को अपनी सुरक्षा के लिए डरते हुए जीना पड़े, तो हमारी प्रगति के दावों पर सवाल उठना स्वाभाविक है। गौतम बुद्ध की करुणा और स्वामी विवेकानंद के मानवीय विचारों की विरासत रखने वाला समाज किसी पीड़ित लड़की को ही कटघरे में खड़ा कर दे, तो हमें अपने व्यवहार का कठोर मूल्यांकन करना होगा।
हम इक्कीसवीं सदी में हैं। तकनीक आगे बढ़ रही है, शहर बदल रहे हैं, बड़ी योजनाओं की घोषणाएँ हो रही हैं। लेकिन किसी लड़की के लिए स्कूल, कॉलेज, कार्यस्थल और घर के बीच का रास्ता भय से भरा हो, तो विकास उसके जीवन तक पहुँचा ही कहाँ?
देश की तरक्की का एक जरूरी पैमाना यह भी है कि उसकी बेटियाँ कितनी स्वतंत्र, सुरक्षित और सम्मानित हैं।
किसी लड़की के साथ अवांछित स्पर्श होता है, उसका पीछा किया जाता है, उस पर अश्लील टिप्पणी की जाती है या उसे धमकाया जाता है। अपराध करने वाला अपने रास्ते चला जाता है, लेकिन पीड़ित लड़की के भीतर डर ठहर जाता है। वह सोचती है—बताऊँगी तो क्या होगा? क्या मेरी बात मानी जाएगी? क्या घर से निकलना बंद कर दिया जाएगा? क्या मेरी पढ़ाई छूट जाएगी? क्या लोग मुझे ही दोषी ठहराएँगे?
इस डर को पैदा करने में अपराधी के साथ समाज की भी भूमिका है। जब शिकायत सुनते ही पहला सवाल होता है—“तुम वहाँ क्यों गई थीं?”—तो पीड़िता को सहायता मिलने से पहले अपने अस्तित्व का बचाव करना पड़ता है।
उसे यह सुनने की जरूरत है: “तुम्हारे साथ जो हुआ, वह गलत है। तुम्हारी गलती नहीं है। हम तुम्हारे साथ हैं।”
लेकिन हम अक्सर उसके कपड़े देखते हैं, उसके लौटने का समय देखते हैं, उसके मित्रों के नाम पूछते हैं और उसके चरित्र पर चर्चा करने लगते हैं। अपराधी के आचरण की जगह पीड़िता की दिनचर्या जाँचने वाला समाज न्याय का रास्ता कठिन बना देता है।
हमारे घरों में भी यह दोहरा मानदंड दिखाई देता है। लड़का देर रात लौटे तो उसे सामान्य मान लिया जाता है। लड़की एक घंटा देर से आए तो सवालों की कतार लग जाती है। उसकी सुरक्षा की चिंता उचित है, लेकिन उस चिंता के नाम पर उसकी स्वतंत्रता छीन लेना उचित नहीं।
बेटों से भी पूछा जाना चाहिए कि वे दूसरों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं। उन्हें बचपन से सिखाना होगा कि किसी लड़की की इच्छा, असहमति और निजी सीमा का सम्मान करना अनिवार्य है। कोई लड़की बात नहीं करना चाहती तो उसका पीछा करना प्रेम नहीं है। उसकी असहमति के बाद दबाव डालना अधिकार नहीं है। किसी की चुप्पी को सहमति समझ लेना गंभीर अन्याय है।
बेटियों को सावधान रहने की शिक्षा देने के साथ बेटों को जवाबदेह होने की शिक्षा भी देनी होगी।
सबसे पीड़ादायक स्थिति तब होती है जब कोई छात्रा रास्ते में होने वाली छेड़खानी की शिकायत घर पर करती है और समाधान के रूप में उसकी पढ़ाई बंद कर दी जाती है। दोष किसी और का होता है, लेकिन सजा उसके सपनों को मिलती है। उसका स्कूल छूटता है, कॉलेज छूटता है, आत्मविश्वास टूटता है और आर्थिक स्वतंत्रता का रास्ता बंद होने लगता है।
माता-पिता की चिंता को समझा जा सकता है। लेकिन बेटी का भविष्य रोक देने से रास्ता सुरक्षित नहीं होता। परिवार, विद्यालय, स्थानीय प्रशासन और पुलिस को मिलकर ऐसा वातावरण बनाना होगा जिसमें वह पढ़ सके और शिकायत करने पर उसे संरक्षण मिले।
जिस लड़की ने बोलने का साहस किया है, उसे और अकेला कर देना उसके साथ दूसरा अन्याय है।
इसीलिए पुलिस की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। नागरिक पुलिस के पास सुरक्षा की उम्मीद लेकर जाता है। यदि किसी पुलिसकर्मी पर महिला से दुर्व्यवहार, अनुचित स्पर्श या अपमान का आरोप लगे, तो उसकी निष्पक्ष और समयबद्ध जाँच आवश्यक है। वर्दी किसी को जवाबदेही से छूट नहीं देती।
दिल्ली पुलिस से जुड़े किसी महिला पत्रकार के साथ कथित दुर्व्यवहार का प्रश्न भी इसी कसौटी पर देखा जाना चाहिए। आरोपों की सच्चाई जाँच से सामने आए, संबंधित साक्ष्य सुरक्षित रखे जाएँ और शिकायतकर्ता को दबाव या प्रतिशोध से संरक्षण मिले। यदि आरोप सिद्ध हों, तो कानून के अनुसार कार्रवाई हो। पद और विभाग की प्रतिष्ठा बचाने के लिए शिकायत दबा देना जनता के विश्वास को चोट पहुँचाता है।
पत्रकार समाज की समस्याओं को सामने लाते हैं। किसी महिला पत्रकार को अपना काम करते समय अपमान या उत्पीड़न सहना पड़े, तो उसकी सुरक्षा के साथ स्वतंत्र पत्रकारिता पर भी प्रश्न उठता है। फिर भी हमें याद रखना चाहिए कि उतनी ही संवेदनशीलता उस महिला के लिए भी जरूरी है जिसके पास कैमरा, मंच या प्रभावशाली परिचय नहीं है।
न्याय हर महिला तक पहुँचना चाहिए—चाहे वह पत्रकार हो, छात्रा हो, मजदूर हो या किसी छोटे कस्बे में रहने वाली गृहिणी।
आज सरकार से सवाल करना जरूरी है। महिला सुरक्षा के नारे सुनाई देते हैं, लेकिन शिकायत करने वाली महिला को वास्तविक सहायता कितनी आसानी से मिलती है? थाने में उसकी बात कितनी संवेदनशीलता से सुनी जाती है? उसे बार-बार अपमानजनक सवालों से गुजरना पड़ता है या सम्मान के साथ प्रक्रिया समझाई जाती है? जाँच में देरी होने पर कौन जवाब देता है?
सरकार की जिम्मेदारी घोषणा के बाद शुरू होती है। सुरक्षित सार्वजनिक परिवहन, प्रभावी पुलिस व्यवस्था, जवाबदेह अधिकारी, सहायता सेवाएँ और शिकायत पर ठोस कार्रवाई—इनसे नागरिक का भरोसा बनता है। किसी दुखद घटना के बाद बयान देना पर्याप्त नहीं है। ऐसी व्यवस्था चाहिए जो उत्पीड़न रोके और शिकायत होने पर पीड़िता को अकेला न छोड़े।
न्यायिक प्रक्रिया को लेकर उठने वाली पीड़ा भी सुनी जानी चाहिए। किसी गंभीर मामले में आरोपी को जमानत मिलने या मुकदमे में देरी होने से पीड़ित परिवार हताश हो सकता है। लेकिन जमानत, दोषमुक्ति और दोषसिद्धि अलग-अलग बातें हैं। हमें इन भेदों को समझते हुए प्रभावी जाँच, निष्पक्ष सुनवाई और पीड़ित पक्ष की सुरक्षा की माँग करनी चाहिए।
न्याय पर भरोसा तभी मजबूत होगा जब प्रक्रिया नागरिक को समझ आए, उसकी गरिमा सुरक्षित रहे और अनावश्यक देरी का बोझ उसके जीवन को न कुचल दे।
महिलाओं की सुरक्षा के साथ आज युवाओं के भविष्य का प्रश्न भी हमें बेचैन करता है। पढ़ाई पूरी करने के बाद रोजगार की तलाश में भटकता युवा केवल नौकरी नहीं खोज रहा होता; वह अपने परिवार की उम्मीद, अपनी मेहनत का सम्मान और स्वतंत्र जीवन का अवसर तलाश रहा होता है।
जब भर्ती की प्रक्रिया अस्पष्ट हो, परीक्षा या परिणाम को लेकर अनिश्चितता बनी रहे और शिकायतों का स्पष्ट उत्तर न मिले, तो उसका विश्वास कमजोर पड़ता है। वह सड़कों पर आवाज उठाए तो उसे सुनना शासन का दायित्व है। शांतिपूर्ण प्रश्न और विरोध लोकतंत्र में नागरिक की भागीदारी हैं।
युवा सरकार से पूछे कि अवसर कहाँ हैं, चयन कब होगा और प्रक्रिया कितनी निष्पक्ष है, तो उसे ठोस उत्तर मिलना चाहिए। राजनीतिक भाषण उसके खोए समय की भरपाई नहीं कर सकते। रोजगार की चिंता से जूझ रहे नौजवान को सम्मान, स्पष्ट जानकारी और भरोसेमंद व्यवस्था चाहिए।
समाज को भी अपने युवाओं के प्रति संवेदनशील होना होगा। बेरोजगार बेटे या बेटी को हर दिन ताने देना उनकी समस्या हल नहीं करता। उनकी कठिनाई समझना और उनके साथ खड़े रहना जरूरी है।
आज हमारी सार्वजनिक चर्चा में एक और संकट दिखाई देता है। कई बार लोग किसी घटना पर अपनी प्रतिक्रिया पीड़ित की तकलीफ देखकर नहीं, अपनी राजनीतिक पसंद देखकर तय करते हैं। अपनी पसंद की सरकार हो तो चुप्पी, दूसरी सरकार हो तो आक्रोश—यह व्यवहार जवाबदेही को कमजोर करता है।
किसी दल का समर्थन हमें अन्याय के प्रति मौन रहने के लिए बाध्य नहीं कर सकता।
सरकार किसी भी दल की हो, उससे सवाल पूछने का अधिकार नागरिक के पास रहना चाहिए। सत्ता की आलोचना को देश के प्रति अपमान मान लेना लोकतंत्र की समझ को संकुचित करता है। देश से प्रेम करने वाला नागरिक अपने देश की कमियों पर बोलता भी है, क्योंकि वह बेहतर व्यवस्था चाहता है।
धर्म, जाति और पहचान के आधार पर बँटकर हम अपनी साझा समस्याओं का समाधान और कठिन बना देते हैं। असुरक्षित बेटी, परेशान किसान, बेरोजगार युवा और न्याय की प्रतीक्षा करता परिवार किसी राजनीतिक नारे से राहत नहीं पाता। उन्हें ऐसे संस्थान चाहिए जो निष्पक्ष होकर काम करें।
भारत की विविधता हमारी साझा जिम्मेदारी है। किसी समुदाय की पीड़ा को छोटा और दूसरे की पीड़ा को बड़ा मानने से विश्वास टूटता है। कानून के सामने समान सम्मान और नागरिक जीवन में बराबर अवसर हमारी सार्वजनिक प्रतिबद्धता होने चाहिए।
मैं समाज से पूछना चाहता हूँ—जब कोई लड़की सहायता माँगती है, तब हम उसके साथ खड़े होते हैं या उसकी बदनामी की आशंका गिनाने लगते हैं? जब कोई छात्रा उत्पीड़न के कारण पढ़ाई छोड़ती है, तब हम उसे निजी पारिवारिक मामला मानकर भूल जाते हैं? जब कोई युवा अपने भविष्य के लिए प्रश्न करता है, तब हम उसकी बात सुनते हैं या उसे चुप रहने की सलाह देते हैं?
हमारी खामोशी का असर पड़ता है। इससे पीड़ित अकेला महसूस करता है और गलत आचरण करने वाला जवाबदेही से बचने की उम्मीद पालता है।
बदलाव हमारे घरों से शुरू हो सकता है। बेटी की बात विश्वास और संवेदनशीलता से सुनिए। बेटे को सम्मानजनक व्यवहार सिखाइए। किसी पीड़ित की पहचान और निजी विवरण फैलाकर उसके जीवन को कठिन मत बनाइए। विद्यालयों और कार्यस्थलों में शिकायत की प्रक्रिया प्रभावी बनाइए। अधिकारियों से उत्तर माँगिए और शांतिपूर्ण ढंग से नागरिक अधिकारों के लिए खड़े रहिए।
मैं सरकार से आग्रह करता हूँ कि महिलाओं की सुरक्षा और युवाओं के भविष्य को रोजमर्रा के शासन की प्राथमिकता बनाए। शिकायतों के निस्तारण में पारदर्शिता हो, लापरवाही पर जवाबदेही तय हो और नागरिक को यह भरोसा मिले कि उसकी आवाज सुनी जाएगी।
मैं युवाओं से भी कहना चाहता हूँ—अपनी आवाज उठाइए, तथ्यों के साथ उठाइए और संवैधानिक रास्तों से उठाइए। अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करते हुए दूसरों के अधिकारों का सम्मान कीजिए। महिला सुरक्षा को महिलाओं का अकेला विषय मत समझिए। यह आपके समाज और आपके भविष्य का भी प्रश्न है।
आज मैं निःशब्द हूँ, लेकिन इस पीड़ा को स्थायी चुप्पी नहीं बनने देना चाहता। मेरी कलम इसलिए उठी है कि किसी बेटी को शिकायत करने से पहले अपना भविष्य खोने का डर न सताए। किसी युवा को अपने सवाल के कारण अपमानित न होना पड़े। किसी नागरिक को न्याय माँगते समय अपनी पहचान या पहुँच का सहारा न खोजना पड़े।
हमारी बेटियाँ भय के साथ जीने के लिए पैदा नहीं हुई हैं। हमारे युवा अंतहीन प्रतीक्षा के लिए शिक्षित नहीं हुए हैं। और नागरिकों ने लोकतंत्र को केवल मतदान के दिन तक सीमित रखने के लिए स्वीकार नहीं किया है।
बेटियों की आवाज सुनिए। युवाओं के सवाल सुनिए। समाज और सत्ता—दोनों अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करें।
आज बोलना जरूरी है, क्योंकि आने वाली पीढ़ियाँ हमसे पूछेंगी—जब सम्मान, सुरक्षा और भविष्य पर सवाल उठ रहे थे, तब आप कहाँ खड़े थे?
— अधिवक्ता राजेश कुमार बोकारो
राष्ट्रीय ब्यूरो प्रमुख एवं विधिक सलाहकार, TTN24 नेशनल न्यूज़ चैनल
