Etawah News: शरद पूर्णिमा पर श्री शांतिनाथ विधान का भव्य आयोजन: मुनि श्री भावसागर महाराज के सानिध्य में गूंजे भक्तिमय भजन*
*आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के अवतरण दिवस एवं नवाचार्य श्री समयसागर जी महाराज और गणिनीप्रमुख आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी के 92वें अवतरण दिवस पर हुआ धार्मिक आयोजन*
रिपोर्ट एम एस वर्मा मनोज कुमार TTN 24 NEWS
जसवंतनगर, इटावा। पावन शरद पूर्णिमा के अवसर पर नगर के श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर में परम पूज्य आचार्य भगवन श्री 108 विद्यासागर जी महाराज के अवतरण दिवस तथा नवाचार्य श्री 108 समयसागर जी महाराज एवं पूज्य गणिनीप्रमुख आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी के 92वें अवतरण दिवस के उपलक्ष्य में भव्य श्री शांतिनाथ विधान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम पूज्य श्रमण मुनि श्री 108 भावसागर महाराज के पावन सानिध्य में संपन्न हुआ।धार्मिक आयोजन में सौधर्म इंद्र बनने का सौभाग्य एकांश जैन एवं अनीता जैन परिवार को प्राप्त हुआ, जबकि जिनवाणी विराजमान करने का सौभाग्य नलिन जैन परिवार को मिला। इस अवसर पर पूज्य आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के चित्र का अनावरण राजकुमार जैन ने किया। विधानाचार्य कमल शास्त्री ने विधि-विधानपूर्वक श्री शांतिनाथ विधान संपन्न कराया।
विधान के दौरान फिरोजाबाद से आईं सृष्टि जैन ने अपनी मधुर एवं भक्तिमय गायकी से श्रद्धालुओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। भजनों की मधुर धुनों से मंदिर परिसर भक्तिमय हो उठा और उपस्थित श्रद्धालु भक्ति में लीन नजर आए।

*मुनि श्री भावसागर महाराज ने सुनाए आचार्य श्री विद्यासागर जी के संस्मरण*
धर्मसभा को संबोधित करते हुए पूज्य मुनि श्री भावसागर महाराज ने आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के जीवन, तप, त्याग और साधना से जुड़े विभिन्न संस्मरण सुनाए। उन्होंने बताया कि आचार्य श्री का जीवन आत्मकल्याण, संयम, करुणा और धर्म के प्रति समर्पण की अनुपम प्रेरणा देता है। उनके आदर्शों को जीवन में अपनाना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है।

*गणिनीप्रमुख आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी के जीवन पर डाला प्रकाश*
मुनि श्री भावसागर महाराज ने पूज्य गणिनीप्रमुख आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी के जीवन और उनकी आध्यात्मिक साधना पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि माताजी का जन्म उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जनपद के टिकैतनगर में हुआ था। बचपन से ही उनमें धर्म और वैराग्य के संस्कार विद्यमान थे। उन्होंने बाल्यावस्था में आचार्य देशभूषण महाराज से आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत ग्रहण किया तथा बाद में आचार्य वीरसागर जी महाराज से आर्यिका दीक्षा प्राप्त कर बचपन की मैना ने ज्ञानमती माताजी के रूप में अपनी आध्यात्मिक यात्रा को आगे बढ़ाया।मुनि श्री ने बताया कि ज्ञानमती माताजी ने अपने जीवन में धर्म, दर्शन, जैन आगम और आध्यात्मिक विषयों पर साढ़े पांच सौ से अधिक ग्रंथों की रचना कर साहित्य जगत को महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उनका जीवन त्याग, तपस्या, विद्वत्ता और धर्म प्रभावना का प्रेरणादायी उदाहरण है। माताजी के 92 वें अवतरण दिवस के अवसर पर उनके दीर्घ आध्यात्मिक जीवन, साधना और धर्म के प्रति समर्पण का स्मरण किया गया।
