दीया जलाइए, पर पहले डूबते भारत को बचाइए!
17 सितंबर: उत्सव का दिन या जन-सरोकारों पर सवाल का दिन?
17 सितंबर को प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के जन्मदिन के अवसर पर “आशीर्वाद का एक दिया” जलाने की अपील की जा रही है। देशभर में भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्री और नेता इसे बड़े उत्सव के रूप में मनाने की तैयारी कर रहे हैं।
पर देश की जनता का एक सीधा सवाल है—यह दिया आखिर कहाँ जलाया जाए?
क्या बिहार के उन बाढ़ग्रस्त जिलों में जलाया जाए, जहाँ खेतों में खड़ी फसलें पानी में डूब गईं, किसानों की मेहनत बर्बाद हो गई और परिवार राहत की प्रतीक्षा में हैं?
क्या उन बेघर लोगों के पास जलाया जाए, जो सड़क किनारे, पुलों के नीचे या अस्थायी तिरपालों में जीवन गुजार रहे हैं?
क्या उन बेरोजगार युवाओं के हाथों में दिया दिया जाए, जिनके पास डिग्री है, हुनर है, लेकिन रोजगार नहीं है?
क्या उन किसानों के नाम दिया जलाया जाए, जो कर्ज, महंगाई और फसल बर्बादी के कारण मानसिक संघर्ष झेल रहे हैं?
या फिर उन आदिवासी परिवारों के बीच, जिनकी जमीन, जंगल और आजीविका के सवाल आज भी अनुत्तरित हैं?
देश को प्रतीकों की नहीं, समाधान की जरूरत है। दीप जलाना हमारी संस्कृति की सुंदर परंपरा है; लेकिन जब जनजीवन संकट में हो, तब शासन की पहली जिम्मेदारी राहत, रोजगार, सुरक्षा, स्वास्थ्य और न्याय सुनिश्चित करना है।
बिहार में बाढ़ आती है तो केवल पानी नहीं बढ़ता—लोगों की पीड़ा, भूख, बेबसी और असुरक्षा भी बढ़ती है। ऐसे समय में सरकारों का धर्म है कि वे राहत शिविर, भोजन, दवा, पुनर्वास, फसल क्षति का मुआवजा और बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था प्राथमिकता से करें।
दिल्ली जैसे महानगर में किसी छात्रावास या भवन दुर्घटना में मासूमों की जान जाती है तो सवाल केवल हादसे का नहीं रहता; सवाल जवाबदेही का होता है। क्या संवेदनशील शासन की आवाज पीड़ित परिवारों तक पहुँची? क्या दोषियों पर कार्रवाई हुई? क्या ऐसी घटनाएँ दोबारा न हों, इसकी गारंटी बनी?
मणिपुर की पीड़ा, छत्तीसगढ़ के आदिवासी क्षेत्रों की चिंता, किसानों का संघर्ष, युवाओं की बेरोजगारी और बढ़ती महंगाई—ये सभी मुद्दे किसी एक दल के नहीं, पूरे देश के हैं। इन पर सवाल उठाना राजनीति नहीं, लोकतंत्र का धर्म है।
विपक्ष के नेता राहुल गांधी हों या कोई अन्य जनप्रतिनिधि—जनता का पैमाना एक ही होना चाहिए: किसने बेरोजगारों की बात की, किसने बाढ़ पीड़ितों की मदद की, किसने किसानों को सहारा दिया, किसने बच्चों की सुरक्षा और आम आदमी की गरिमा के लिए आवाज उठाई?
प्रधानमंत्री का जन्मदिन मनाइए, शुभकामनाएँ दीजिए—यह लोकतांत्रिक अधिकार है। लेकिन उत्सव से पहले देश की वास्तविक तस्वीर भी देखिए। किसी भी नेता के सम्मान का सबसे बड़ा तरीका यह है कि उसके नाम पर गरीब की मदद हो, बेरोजगार को रोजगार मिले, किसान को न्याय मिले और आपदा पीड़ित को राहत मिले।
17 सितंबर को यदि दिया जलाना है, तो उसे केवल फोटो और प्रचार के लिए नहीं—बाढ़ पीड़ित की झोपड़ी में, बेरोजगार युवा के सपनों में, किसान के खेत में और बेघर परिवार की उम्मीद में जलाइए।
देशवासियों, जागिए।
कहीं ऐसा न हो कि हम ताली, थाली और दीये में उलझे रह जाएँ, और हमारे असली सवाल—रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, किसान, सुरक्षा और न्याय—अंधेरे में ही रह जाएँ।
दीया जलाइए, लेकिन सवाल भी उठाइए।
उत्सव मनाइए, लेकिन पीड़ा को मत भूलिए।
नेता का सम्मान कीजिए, लेकिन जनता का अधिकार सबसे ऊपर रखिए।
लेखक:
अधिवक्ता राजेश कुमार
बोकारो सिविल कोर्ट
