“बेटा, स्कूल जाओ… सपने देखो”—जब अदालत के शब्दों ने एक बच्ची के भविष्य को दिया हौसला
✍️ अधिवक्ता राजेश कुमार की कलम से
अदालत का फैसला अपराध की सजा तय करता है। कभी-कभी उसी फैसले में लिखे कुछ शब्द किसी घायल मन को यह भरोसा भी देते हैं कि उसकी आवाज सुनी गई है, उसके दुख को समझा गया है और उसका भविष्य अब भी उम्मीदों से भरा हो सकता है।
दिल्ली की एक अदालत ने सात वर्ष की बच्ची से दुष्कर्म के दोषी को उम्रकैद की सजा सुनाते हुए बच्ची के नाम ऐसा ही संवेदनशील संदेश लिखा। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश रजनी रंगा के शब्दों में न्याय की दृढ़ता के साथ एक बच्ची के बचपन और भविष्य के लिए गहरी चिंता दिखाई दी।
न्यायाधीश का संदेश—आपके उपलब्ध कराए विवरण के अनुसार:
“यह अदालत तुम्हारा बचपन वापस नहीं ला सकती। लेकिन अदालत तुम्हें यह भरोसा दिला सकती है कि तुम्हारी बात सुनी गई। तुम्हारी गुहार स्वीकार की गई। अब बेटा अपनी जिंदगी जियो। स्कूल जाओ, दोस्त बनाओ, हंसो, खेलो व सपने देखो। यह अदालत तुम्हारे साहस को हमेशा याद रखेगी।”
इन शब्दों पर ठहरकर सोचिए। स्कूल जाना, दोस्त बनाना, हंसना, खेलना और सपने देखना—ये किसी बच्चे की जिंदगी की सबसे सहज खुशियां हैं। जब किसी बच्ची को इन्हीं खुशियों की ओर लौटने का हौसला देना पड़े, तब समझ आता है कि अपराध उसके जीवन को कितनी गहराई तक प्रभावित करता है।
इस संदेश की भावनात्मक प्रतिध्वनि
इस संदेश को पढ़ते हुए मन में यही भाव उठता है कि बच्ची को अपनी पीड़ा से कहीं बड़ी पहचान पाने का अधिकार है। उसकी पहचान उसकी मुस्कान से बने, उसकी पढ़ाई से बने, उसकी पसंद और उसके सपनों से बने। उसके लिए आगे बढ़ने का अर्थ जबरन सब भूल जाना नहीं होना चाहिए। उसे समय मिले, अपनापन मिले और ऐसा सुरक्षित वातावरण मिले, जहां वह बिना किसी दबाव के फिर से अपने मन की बात कह सके।
जिस बच्ची की बात न्यायालय ने सुनी, उसकी जरूरतों को परिवार, समाज और संस्थाओं को भी उसी संवेदनशीलता से सुनना होगा।
दिल्ली हाई कोर्ट ने भी संदेश की सराहना की
न्यायमूर्ति प्रतिभा एम. सिंह और न्यायमूर्ति दिनेश भट्ट की पीठ ने सत्र न्यायाधीश के इस संदेश की सराहना करते हुए इसे प्रिंट कराकर पीड़ित परिवार को सौंपने का निर्देश दिया। साथ ही बच्ची के लिए ₹10 लाख 50 हजार मुआवजा देने के निर्देश भी दिए गए। दिल्ली विधिक सेवा के सचिव को इन निर्देशों का दो सप्ताह के भीतर पालन करने को कहा गया।
यह आदेश दोषी सुमित शाक्य की उस अपील पर सुनवाई के दौरान आया, जिसमें उसने अपनी दोषसिद्धि और सजा को चुनौती दी है। हाई कोर्ट ने पुलिस और पीड़ित पक्ष को नोटिस जारी किया है। अपील की अगली सुनवाई 20 जनवरी 2027 को निर्धारित है; अपील पर अंतिम निर्णय अभी होना बाकी है।
मामला बुध विहार थाने में दर्ज है। घटना 23 जुलाई 2023 की बताई गई है। उस समय बच्ची सात वर्ष की थी और अब उसकी उम्र लगभग दस वर्ष है। फैसले में बच्ची की उस इच्छा का भी उल्लेख किया गया कि अपराधी के बूढ़ा होने तक वह जेल में रहे।
इतनी छोटी उम्र में ऐसी इच्छा व्यक्त करना उसके भीतर के भय और सुरक्षित रहने की चाह को सामने लाता है।
कोई मुआवजा उस पीड़ा का मूल्य नहीं हो सकता। लेकिन शिक्षा, देखभाल और पुनर्वास के लिए आर्थिक सहायता उसके भविष्य को संवारने में महत्वपूर्ण सहारा बन सकती है। उसके साथ खड़े रहने का अर्थ यह भी है कि उसकी निजता सुरक्षित रहे और उसे बार-बार अपनी तकलीफ बताने के लिए मजबूर न होना पड़े।
अदालत के संदेश का सबसे कोमल शब्द शायद “बेटा” है। इस संबोधन में एक बच्ची को सुने जाने का विश्वास मिलता है। और “सपने देखो” में उसके आने वाले कल के लिए जगह बनती है।
हम सबकी जिम्मेदारी है कि उस जगह को सुरक्षा, सम्मान और स्नेह से भरें—ताकि बच्ची अपनी गति से आगे बढ़ सके और उसके जीवन में हंसने, खेलने तथा सपने देखने के अवसर फिर खिल सकें।
