सूखे की तपिश पर आस्था का रंग भारी, बोधेगांव की बन्नो माँ यात्रा में उमड़ा जनसैलाब
संदल-छबीना, कव्वाली और लोककलाओं की धूम; हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल बनी सदियों पुरानी परंपरा
बोधेगांव, अहिल्यानगर, महाराष्ट्र।
एक ओर सूखे की मार और दूसरी ओर आस्था का अटूट विश्वास! महाराष्ट्र के अहिल्यानगर जिले के बोधेगांव में श्री साध्वी बन्नो माँ की वार्षिक यात्रा श्रद्धा, सद्भाव और लोकसंस्कृति के रंगों से सज उठी है। यहां धर्म की सीमाएं सिमट जाती हैं और इंसानियत, भाईचारे तथा परंपरा के रिश्ते मजबूत होते नजर आते हैं। महाराष्ट्र सहित विभिन्न क्षेत्रों से हिंदू और मुस्लिम श्रद्धालुओं का आगमन इस यात्रा को विशेष पहचान दे रहा है। आसपास के करीब 40 से 50 गांवों के लिए यह यात्रा धार्मिक उत्सव के साथ सामाजिक मेल-मिलाप और खरीदारी का भी बड़ा अवसर है।
बुधवार, 28 अक्टूबर को यात्रा का शुभारंभ हुआ। रात करीब 11 बजे मान का संदल पारंपरिक गाजे-बाजे के साथ बन्नो माँ की दरगाह पर अर्पित किया जाता है। इससे पहले गोदावरी नदी से लाया गया पवित्र जल समाधि पर अर्पित करने की परंपरा निभाई जाती है। गुरुवार, 29 अक्टूबर को शेवगांव पुलिस स्टेशन की ओर से पुलिस निरीक्षक के हाथों छबीने की चादर अर्पित की जाएगी। इसी दिन लगने वाला घोड़ों का विशेष बाजार भी लोगों के आकर्षण का केंद्र रहता है।
शुक्रवार, 30 अक्टूबर को रात नौ बजे बन्नो माँ दरगाह के सभामंडप में कव्वाली की महफिल सजेगी। सूफियाना सुरों और कव्वालों की प्रस्तुतियों से वातावरण भक्तिमय होने की उम्मीद है।
हिंदू परिवार से निकलता है मान का संदल, एकता की परंपरा कायम
इस यात्रा की सबसे विशिष्ट पहचान मान के संदल की वह परंपरा है, जिसमें संदल एक हिंदू परिवार के घर से निकलता है और बन्नो माँ की दरगाह तक पहुंचता है। श्रद्धालु अपनी मन्नतों और आस्था के प्रतीक के रूप में चादरें अर्पित करते हैं। धर्म और समुदाय की सीमाओं से परे यह परंपरा बोधेगांव की साझा सांस्कृतिक विरासत और आपसी सद्भाव को जीवंत करती है।
लोककलाकारों की कला का सम्मान, शनिवार को मानधन वितरण
संदल और छबीना सहित तीन दिनों तक विभिन्न क्षेत्रों से आए कलाकार अपने वाद्यवृंदों और पारंपरिक कलाओं की प्रस्तुतियां देते हैं। शनिवार को कलाकार यात्रा पंच कमेटी के समक्ष अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं और परंपरा के अनुसार मानधन प्राप्त करते हैं। स्थानीय स्तर पर इस बिदागी की परंपरा को ‘हजऱ्या’ कहा जाता है। यह आयोजन लोककलाओं को सम्मान देने और कलाकारों की परंपरा को आगे बढ़ाने का माध्यम है।
महिलाओं की खरीदारी से गुलजार होता है विशाल बाजार
यात्रा में महिलाओं के लिए आभूषण, चूड़ियां, कपड़े, पर्स और श्रृंगार की वस्तुओं के बड़े-बड़े स्टॉल सजते हैं। साल में एक बार लगने वाले इस बाजार का आसपास के 40 से 50 गांवों की महिलाएं इंतजार करती हैं। परिवार और बच्चों के साथ पहुंची महिलाएं अपनी जरूरत और पसंद की वस्तुओं की खरीदारी करती दिखाई देती हैं। इससे स्थानीय व्यापारियों और छोटे दुकानदारों को भी कारोबार का अवसर मिलता है।
खाऊ गली की चहल-पहल, झूलों का रोमांच और ‘मौत का कुआं’
यात्रा की रौनक बढ़ाने में बच्चों की खाऊ गली की खास भूमिका रहती है। तरह-तरह के व्यंजन, चटपटे खाद्य पदार्थ और पेय पदार्थों की दुकानें यहां स्वाद का अलग संसार रचती हैं। रंग-बिरंगे खिलौनों के स्टॉल बच्चों को लुभाते हैं, तो विशाल झूले और ‘मौत का कुआं’ रोमांच के शौकीनों को अपनी ओर खींचते हैं। बच्चों से लेकर बड़ों तक और परिवारों के साथ पहुंचे लोगों की भीड़ से पूरा परिसर मेले के उल्लास में डूब जाता है।
कुश्ती, तमाशा और घोंगड़ी की पारंपरिक पहचान
कुश्ती के अखाड़े, पारंपरिक तमाशे और विविध लोककलाओं की प्रस्तुतियां यात्रा को सांस्कृतिक रंग देती हैं। भेड़ की ऊन से बनी पारंपरिक घोंगड़ी भी यहां बिक्री के लिए उपलब्ध रहती है। गन्ना कटाई के मौसम में कई मजदूर यात्रा में शामिल होने के बाद अपने काम पर रवाना होते हैं। वहीं, रोजगार और व्यवसाय के सिलसिले में बाहर रहने वाले ग्रामीण भी इस अवसर पर अपने गांव लौटते हैं। इससे गांव में रौनक बढ़ती है और स्थानीय बाजार में आर्थिक गतिविधियां तेज होती हैं।

पंच कमेटी की ओर से तैयारियां पूरी
यात्रा पंच कमेटी के अध्यक्ष कुंडलिकराव घोरतळे ने बताया कि यात्रा शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न कराने के लिए आवश्यक तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। दरगाह परिसर को आकर्षक विद्युत रोशनी से सजाने का कार्य नाना खोले ने किया है।
सूखे की कठिन परिस्थितियों के बीच भी बोधेगांव की बन्नो माँ यात्रा यह संदेश दे रही है कि आस्था केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने वाली शक्ति भी है। संदल की खुशबू, कव्वाली के सुर, लोककलाओं की जीवंतता और बाजार की रौनक के बीच यह यात्रा हिंदू-मुस्लिम एकता, सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक भाईचारे की एक अनूठी तस्वीर पेश कर रही है।
