सुनील गुप्ता फतेहपुर यूपी
*धार्मिक आस्था का सम्मान हो, और राजनीति में संवैधानिक मर्यादा कायम रहे
मिस्बाहुल हक़*
पैगम्बर इस्लाम हज़रत मोहम्मद साहब के यौमे पैदाइश को अमन और खुशगवार से मनाए जाने के मौके पर प्रदेश वासियों को मुबारकबाद देते हुए कहा कि आज जब त्योहारों का मौसम आता है तो राजनीतिक गतिविधियाँ और धार्मिक मंचों पर नेताओं की मौजूदगी बढ़ जाती है। ऐसे समय में यह सवाल स्वाभाविक है कि जब जनता रोज़गार, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक न्याय और सुरक्षा जैसे बुनियादी सवालों से जूझती है, तब राजनीतिक नेतृत्व इन मुद्दों पर साल भर कहाँ दिखाई देता है? उन्होंने कहा कि मज़हब इंसान को इंसाफ, अमन, करुणा और दूसरे के अधिकारों का सम्मान करना सिखाता है। भारतीय संविधान भी समानता, स्वतंत्रता, गरिमा, धर्म की स्वतंत्रता और न्याय को लोकतांत्रिक जीवन का आधार मानता है। इसलिए मज़हब और संविधान को टकराव का विषय बनाने के बजाय उनके नैतिक मूल्यों—इंसाफ, बराबरी और इंसान की गरिमा—को राजनीति की कसौटी बनाना चाहिए।
एक सवाल का जवाब देते हुए आखिल भारतीय असंगठित कामगार और कर्मचारी कांग्रेस के प्रदेश कोऑर्डिनेटर मिस्बाहुल हक़ ने कहा
धर्म आस्था का विषय है और राजनीति जनसेवा का किसी भी धर्म, समुदाय या धार्मिक भावना का इस्तेमाल नफ़रत, भय, सामाजिक विभाजन अथवा वोटों के ध्रुवीकरण के लिए नहीं होना चाहिए। लोकतंत्र में नेता की पहचान इस बात से होनी चाहिए कि वह कमजोर, गरीब, मजदूर, किसान, युवा, महिला और वंचित नागरिक के अधिकारों के लिए कितना खड़ा होता है—सिर्फ त्योहारों के मंच पर उसकी उपस्थिति से नहीं।
त्योहार जनता की खुशियों और सामाजिक सद्भाव के अवसर हैं, राजनीतिक प्रदर्शन के नहीं।आज आवश्यकता है ऐसी राजनीति की जो धार्मिक पहचान से ऊपर उठकर संविधान की मर्यादा, सामाजिक न्याय, समान भागीदारी, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और नागरिक सम्मान को अपना केंद्र बनाए।
मिस्बाहुल हक़ ने कहा भारत में रहने वाले सभी मज़हब इंसान को इंसाफऔर भाईचारा सिखाए,संविधान हर नागरिक को बराबरी दे,और राजनीति इन दोनों मूल्यों को जनसेवा में उतारे।
तभी सामाजिक न्याय और सहअस्तित्व बना रह सकता है जिसके लिए तमाम संघर्षों और समतामूलक आंदोलन से हम आज मानवता की गूँज बनाने सब को साथ लेकर चलने में कामयाब हुए हैं
