गुरु के रहते शिष्य को कभी भी अपनी ओर से उपदेश नहीं देना चाहिए :आचार्य श्री पुरुषोत्तम दास त्यागी जी महाराज
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“सादर जय सियाराम”
“गुरु के रहते शिष्य को स्वयं उपदेश नहीं देना चाहिए – शास्त्रीय मर्यादा”
” शास्त्रीय मर्यादा- “गुरु के रहने पर अपने-आप किसी को उपदेश नहीं देना चाहिए”
यह सनातन परंपरा का अत्यंत गूढ़ नियम ऊ ।
1-गुरु ही परंपरा का सेतु हैं :
जब तक साक्षात गुरुदेव विराजमान हैं , तब तक शिष्य का धर्म है- केवल सेवा करना , सुनना और आचरण से सीखना ।
स्वयं व्यासपीठ पर बैठ कर उपदेश देना , गुरु की अवहेलना है ।
2-सुर्य के रहते दीपक का क्या काम :
जैसे सूर्य के प्रकाश में दीपक जलाने का कोई औचित्य नहीं , इसी प्रकार से गुरु के ज्ञान के रहते शिष्य का उपदेश अहंकार मात्र है ।
3-शास्त्र वचन:
“गुरौ सति स्वयं शिष्यो
नोपदिशैत् कदाचन ।
गुरोराज्ञां विना नैव कुर्याद् व्याख्यानमुत्तमम् ।।”
अर्थात- गुरु के रहते शिष्य को कभी भी अपनी ओर से उपदेश नहीं देना चाहिए ।
गुरु आज्ञा के बिना दिया गया ज्ञान निष्फल होता है ।
अतः मर्यादा यही है- गुर के हमक्ष हम केवल शिष्य हैं , वक्ता नहीं , गुरु बोले तो अमृत है , शिष्य बोले तो धृष्टता है ।
“गच्छत: पृष्ठतो गच्छेत् गुरुच्छायां न लंघयेत् ।
नोलम्बणं धारयेद्वैषं नालंकारास्ततोल्बणान्।।”
गुरुदेव के चलते समय शिष्य को गुरुदेव के पीछे चलना चाहिए , शिष्य को गुरुदेव के परछाई का उलंघन नहीं करना चाहिए , गुरुदेव के समक्ष कीमती वेश-भूषा आभूषण आदि नहीं धारण करना चाहिए ,
ये शास्त्रीय मर्यादा है ,
हमारा परिवार-पुरुषोत्तम परिवार सेवाज्ञ ,
[आचार्य श्री पुरुषोत्तम दास त्यागी जी महाराज]
संपूर्ण विश्व ,
संपर्क सूत्र:-6396372583,
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