हमारे लिए तो केवल व केवल श्रद्धा ही सबसे बड़ी भेंट है:आचार्य श्री पुरुषोत्तम दास त्यागी जी महाराज
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“सादर जय सियाराम”
“हमारे लिए श्रद्धा ही सबसे बड़ी भेंट है”
भगवान के लिए तो ,
“पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो में भक्त्या प्रयच्छति ।
तदहं भक्युपहृतमश्रामि प्रयतात्मन:।।”
भगवान कह रहे हैं कि जो भक्त प्रेम से मुझे पत्र , पुष्प , फल या जल अर्पित करता है ,
मैं उसे बड़े ही प्रेम से स्वीकार करता हूं ।
प्रभु को वस्तु नहीं चाहिए ।
प्रभु को भक्त्या चाहिए- भक्ति चाहिए , भाव चाहिए ।
गुरुदेव का निवेदन ,
“हमारे लिए फूल नहीं , फल नहीं , द्रव नहीं ।
हमारे लिए तो केवल व केवल श्रद्धा ही सबसे बड़ी भेंट है।”
हमारे लिए बाहरी सामाग्री नहीं अपितु भीतर का समर्पण चाहिए ।
हमारे लिए समाग्री नहीं अपितु प्रेम चाहिए ।
क्यों क्योंकि ,
1-फूल मुरझा जाता हैं -पर श्रद्धा कभी नहीं मुरझाती ।
2-फल समाप्त हो सकता हैं-पर समर्पण का स्वाद सदा रहता है ।
हर गयी द्रव की बात तो ,
3-द्रव से तन तृप्त हो सकता है- पर आत्मा तो केवल भाव से तृप्त होती है ।
आइए जब भी आएं , खाली हाथ आएं…
पर हृदय में पूरी श्रृद्धा लेकर आएं ।
इसलिए आइए संकल्प लें:
जब भी सेवा का अवसर बनें या मिलें तो सच्चे हृदय से सेवा करें ।
सेवा में झुकना सीख जाएं ।
बाकी सब प्रभु संभाल लेंगे ।।
जय सियाराम ,
[आचार्य श्री पुरुषोत्तम दास त्यागी जी महाराज]
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