भक्त या शिष्य हमारा कभी भी स्वप्नन्न में भी प्रिय नहीं हो सकता: आचार्य श्री पुरुषोत्तम दास त्यागी जी महाराज
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“सादर जय सियाराम”
“गुरु निंदा से बचें”
मुख्य संदेश :
कभी भी , किसी परिस्थिति में गुरु को दोष मत देना ।
गुरु प्रसन्न तो ठाकुर जी प्रसन्न ।
गुरु वो हैं जो हमें ठाकुर जी से मिलाते हैं ।
उन पर दोष लगाना मतलब उस रास्ते पर ही शक करना ।
गुरु को देवता के सामान मानना चाहिए ।
गुरुदेव के प्रत्येक कार्य क्षेत्र में शिष्य का कल्याण ही छिपा होता है ।
भले हमें तुरंत समझ में न आए ।
भगवान कहते हैं कि जो अपने पूज्य गुरुदेव यानी संतजन को निंदा करता है ।
वह भक्त या शिष्य हमारा कभी भी स्वप्नन्न में भी प्रिय नहीं हो सकता हैं ।
क्योंकि गुरु का काम डांटना भी है , और डांटना भी हो सकता है ।
गुरु का काम परीक्षा लेना भी है , परीक्षा लेना भी हो सकता है ।
गुरु का काम बचा लेना भी है ।
जिस दिन हम अपने पूज्य गुरुदेव भगवान पर दोष लगाते हैं ।
उसी दिन भगवान शिष्य से रुठ जाते हैं ।
गुरु वो नाव हैं जो हमें भवसागर से पार लगाती हैं ।
नाव में छेद मत करो ।
आइए आज संकल्प लें ।
“गुरु आज्ञा ही जीवन है”
“गुरु प्रसन्न तो ठाकुर जी प्रसन्न”
जिस दिन शिष्य को यह बात समझ में आ गया उसी दिन ही शिष्य का आधा रास्ता कट गया ।
[आचार्य श्री पुरुषोत्तम दास त्यागी जी महाराज]
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