Etawah News: गुरु पूर्णिमा पर मुनि श्री भाव सागर महाराज के चरणों में उमड़ा श्रद्धा का सागर

Etawah News: गुरु पूर्णिमा पर मुनि श्री भाव सागर महाराज के चरणों में उमड़ा श्रद्धा का सागर

 

लगभग एक सैकड़ा श्रद्धालुओं ने अर्पित किए श्रीफल, गुरुदेव ने अहंकार व ईर्ष्या त्यागकर सच्चा शिष्य बनने का दिया संदेश

संवाददाता: एम एस वर्मा, मनोज कुमार TTN 24 NEWS

जसवंतनगर। नगर में आयोजित होने जा रहे भव्य चातुर्मास को लेकर जैन समाज में उत्साह का वातावरण है। आचार्य श्री 108 शांतिसागर महाराज की परंपरा के दिव्य संत पूज्य मुनि श्री 108 भाव सागर महाराज के सान्निध्य में गुरु पूर्णिमा महापर्व श्रद्धा, भक्ति एवं समर्पण भाव के साथ मनाया गया।

गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर जसवंतनगर जैन समाज के लगभग एक सैकड़ा श्रद्धालु गुरुदेव के समक्ष समर्पण भाव से उपस्थित हुए। सभी भक्तों ने एक साथ श्रीफल अर्पित कर गुरुदेव का आशीर्वाद प्राप्त किया तथा अपने जीवन को धन्य माना। श्रद्धालु गुरुदेव के विहार स्थल औरैया पहुंचे और पदविहार का सौभाग्य प्राप्त किया। विहार उपरांत संघ बाबरपुर-अजीतमल पहुंचा, जहां भक्तों ने विधि-विधान से गुरुदेव के चरण पखारे तथा चरण वंदना कर धर्मलाभ प्राप्त किया।

चरण वंदना के पश्चात मुनि श्री 108 भाव सागर महाराज ने अपने अमृतमय प्रवचनों से जिनवाणी का श्रवण कराते हुए गुरु पूर्णिमा का महत्व बताया। उन्होंने कहा कि गुरु पूर्णिमा केवल उत्सव नहीं, बल्कि आत्मपरिवर्तन का अवसर है। अहंकार, क्रोध और ईर्ष्या का नाश करना ही गुरु पूर्णिमा का वास्तविक संदेश है। केवल भक्त बनने से नहीं, बल्कि सच्चा शिष्य बनने से जीवन में परिवर्तन आता है।मुनिश्री ने कहा कि हमें गुरु बनाने से अधिक शिष्य बनने का सामर्थ्य विकसित करना चाहिए। वीतरागता के मार्ग पर चलकर ही मनुष्य अपने भीतर के दोषों का क्षय कर सकता है। गुरु का सान्निध्य जीवन को सही दिशा प्रदान करता है और आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है।

गुरुभक्त आशीष जैन ने अपने उद्गार व्यक्त करते हुए कहा कि प्रत्येक जीव के जीवन में गुरु का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। गुरु ही मनुष्य को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाते हैं। यदि किसी के जीवन में गुरु नहीं हैं तो उसका आध्यात्मिक जीवन अभी प्रारंभ ही नहीं हुआ है।

उन्होंने कहा कि जीवन की प्रथम गुरु माता होती हैं तथा माता-पिता ही प्रारंभिक संस्कारों के आधार बनते हैं। इसके पश्चात लौकिक शिक्षा देने वाले शिक्षक गुरु का स्वरूप निभाते हैं। वहीं सद्गुरु तत्वज्ञान का बोध कराकर सम्यक्त्व के मार्ग पर अग्रसर करते हैं और आत्मा को परमात्मा से मिलन की दिशा प्रदान करते हैं।

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